भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ ही आम नागरिकों पर कर्ज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। रिज़र्व बैंक और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2023 में जहां हर भारतीय पर औसतन ₹3.9 लाख का कर्ज था, वहीं 2025 में यह बढ़कर ₹4.8 लाख हो गया है। यानी बीते 2 वर्षों में कर्ज में करीब 23% की बढ़ोतरी हुई है।
इस लेख में हम आपको 5 आसान सवालों और उनके जवाबों के जरिए समझाएंगे कि यह कर्ज कैसे बढ़ा, क्यों बढ़ा और इसका आपके जीवन पर क्या असर हो सकता है।
❓ 1. आखिर हर व्यक्ति पर इतना कर्ज कैसे हुआ?
भारत सरकार को देश चलाने के लिए हर साल भारी रकम खर्च करनी होती है – जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं पर। जब सरकार की आमदनी (टैक्स, ड्यूटी आदि) से यह खर्च नहीं निकलता, तो सरकार उधार लेती है।
सरकारी उधारी का बोझ पूरे देश की आबादी पर बराबर बांटकर देखा जाता है, जिसे ‘प्रति व्यक्ति karj’ कहा जाता है। 2025 में भारत की कुल आबादी करीब 140 करोड़ है और सरकार का कुल karj करीब ₹210 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। जब इस कर्ज को आबादी से भाग करते हैं तो एक व्यक्ति पर ₹4.8 लाख का औसत कर्ज निकलता है।
❓ 2. सिर्फ सरकार ही क्यों ले रही है इतना कर्ज?
सरकार कर्ज इसलिए लेती है ताकि:
- देश में बुनियादी ढांचे (जैसे सड़क, रेल, बिजली) को मजबूत किया जा सके।
- गरीब और किसानों को आर्थिक सहायता दी जा सके।
- शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाएं बेहतर की जा सकें।
- आर्थिक मंदी या संकट की स्थिति में खर्च जारी रखा जा सके।
इसके अलावा, कई बार चुनावी वादों को पूरा करने के लिए भी अतिरिक्त खर्च किया जाता है, जो कर्ज के जरिए ही संभव होता है।

❓ 3. ये कर्ज बढ़ने से आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
प्रति व्यक्ति कर्ज बढ़ने का सीधा मतलब है कि सरकार को कर्ज चुकाने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा। इसका असर कई स्तरों पर हो सकता है:
- 💸 बजट में कटौती: सरकार की आमदनी का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाता है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में बजट कम हो सकता है।
- 📈 मुद्रास्फीति पर असर: अगर सरकार ज्यादा पैसा छापती है तो इससे महंगाई बढ़ सकती है।
- 🧾 टैक्स बढ़ने की संभावना: सरकारी आय बढ़ाने के लिए टैक्स दरें बढ़ाई जा सकती हैं, जिससे आम आदमी की जेब पर असर पड़ेगा।
- ⚖️ भविष्य की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं: नई योजनाओं पर काम करने की गति धीमी हो सकती है क्योंकि फंड्स की कमी हो जाती है।
❓ 4. क्या यह सिर्फ भारत की समस्या है?
नहीं, लगभग हर देश पर कुछ न कुछ karj होता है। अमेरिका, जापान, चीन जैसे बड़े देशों पर भी भारी कर्ज है। लेकिन अंतर यह है कि उनका कर्ज जीडीपी के अनुपात में कितना है और वे उसे कैसे मैनेज करते हैं।
भारत का karj भी अब GDP के 81% से ज्यादा हो चुका है। IMF और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि भारत को अपने खर्च पर नियंत्रण रखना होगा, नहीं तो आने वाले समय में आर्थिक संकट हो सकता है।
❓ 5. समाधान क्या है? भारत इस कर्ज से कैसे निकल सकता है?
कर्ज कोई स्थायी समस्या नहीं है अगर देश की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) तेज़ बनी रहती है। कुछ समाधान निम्नलिखित हो सकते हैं:
- ✅ राजस्व बढ़ाना: सरकार को टैक्स नेटवर्क बढ़ाना होगा ताकि अधिक आय हो सके।
- ✅ खर्च में संतुलन: अनावश्यक खर्चों में कटौती कर आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी होगी।
- ✅ निजीकरण और विनिवेश: घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में देना या बंद करना एक उपाय है।
- ✅ स्थानीय उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा: इससे विदेशी मुद्रा आएगी और देश की आमदनी बढ़ेगी।
- ✅ आम लोगों की भागीदारी: डिजिटल भुगतान, GST, और इनकम टैक्स में पारदर्शिता से सरकार की आय में वृद्धि संभव है।

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📊 कुछ प्रमुख आंकड़े (2023-2025)
| वर्ष | भारत का कुल कर्ज | प्रति व्यक्ति कर्ज | वृद्धि (%) |
|---|---|---|---|
| 2023 | ₹155 लाख करोड़ | ₹3.9 लाख | — |
| 2024 | ₹185 लाख करोड़ | ₹4.4 लाख | +13% |
| 2025 | ₹210 लाख करोड़ | ₹4.8 लाख | +23% |
🧠 निष्कर्ष: क्या हमें चिंतित होना चाहिए?
हां और नहीं – दोनों। अगर देश की आर्थिक विकास दर तेज है और सरकार जिम्मेदारी से खर्च करती है, तो karj कोई बड़ा खतरा नहीं है। लेकिन अगर अनियंत्रित खर्च और टैक्स वसूली में गिरावट रही, तो यह भविष्य के लिए खतरे की घंटी बन सकता है।
आम नागरिक के तौर पर हमें भी वित्तीय अनुशासन का पालन करना चाहिए – जैसे समय पर टैक्स भरना, डिजिटल लेन-देन को अपनाना और फिजूलखर्ची से बचना।
📢 क्या करें आप?
- अपने फाइनेंस को लेकर सतर्क रहें।
- कर्ज लेते समय ब्याज दर, EMI और टर्म्स जरूर समझें।
- सरकार की योजनाओं और नीतियों पर नजर रखें।
- आर्थिक खबरों को नियमित रूप से पढ़ें और शेयर करें।







